गधे की लीद
*गधे की लीद*
सीधी सी बात है, जिसकी भी लीद फ़ायदेमंद हो, लीपने, पोतने या मसाले बनाये जाने योग्य हो वो पूजा का हक़दार होता है हमारे यहाँ। उसके बैकग्राउंड में क़तार लग जाती है आरती सजाये लोगों की। उसका अंग प्रत्यंग पूजनीय हो उठता है। उसकी दुलत्ती आशीर्वाद का पर्याय हो जाती है और उसका रेंकना, राग रागिनियों और साहित्य की श्रेणी मे आ जाता है। उसकी लीद स्वादिष्ट सुगंधित और स्वास्थ्यवर्धक घोषित कर दी जाती है, उसके उपयोग से होने वाले इतने लाभ गिना दिये जाते है कि उससे दूरी रखने वाले उहापोह मे पड़ जाते है।
उपयोगी लीद करने वाले के अवगुण चित नहीं धरे जाते। उसकी कमियाँ गिनाने वाले केवल लात खाने योग्य होते है। उसका कहा सुनने और उसकी ही मानने का चलन है हमारे यहाँ, और यह इसलिये क्योंकि उसकी लीद केवल उन लोगों मे ही बंटती है जो उसकी हाँ मे हाँ मिलाये।
ये सारी प्रशंसा केवल उस भाग्यशाली के हिस्से की है जो हमें फ़ायदा पहुँचा सकता हो, लीद करता हो और इतनी ढेर सारी करता हो कि उसे इकट्ठा करने भर से हमारी हैसियत मे इज़ाफ़ा हो जाये, और फिर ये तारीफ़ें भी अनंतकाल के लिये नहीं होती। अस्थाई प्रकृति की चीज है ये, जैसे ही लीद करने वाला लीद करने का गुण खो देता है, हम उसे वापस धोबी का गधा घोषित कर देते हैं। ये भी हो सकता है कि कोई दूसरा गधा बेहतर गुणवत्ता की लीद उपलब्ध कराने लगे हमें। जब भी ऐसा होता है हम लोग पहले वाले को भूल कर दूसरे गुणी उत्पादक के पिछवाड़े कतारबद्ध हो जाते हैं।
ऐसे हर मौक़े पर कुछ ऐसी बाते होती हैं हमारे यहाँ।
भाईसाहब! गधा बदल लिया आपने?
हाँ, ये वाला पुराने वाले से बेहतर है!
पर आप तो पुराने वाले की, "ना ऐसा हुआ है ना होगा" टाईप की तारीफ़ें किया करते थे, उसके ख़िलाफ़ कुछ सुनने को तैयार होते नहीं थे।
हां करता था, पर हर गधे का अपना वक्त होता है, उसके दिन बीत गये।
सही बात बताइये भाई साहब?
सच ही सुनना है तो सुन लो यार, सच तो ये है कि अब वो क़ायदे से लीद कर नहीं पाता, कमजोर हो चुका, खाता ज़्यादा है निकालता कम है, वो तासीर बची नहीं है अब उसकी लीद में।
कहने जैसी बात ये है कि आप इतने भर से खुश ना हों कि आप गधे है, केवल गधा होना काफी नहीं, आपकी हैसियत हमेशा इस कसौटी पर जाँची और परखी जायेगी कि आप कितनी मात्रा मे लीद कर सकते हैं, और की गई लीद हमारे किसी काम की है भी या नहीं?
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